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Saturday, January 16, 2016

अगर मैं दरिया बन जाता!

मेरे अहम की परछाई तु बनती,
मेरे अक्स के साये से चलती,
मैं तेरे लबो के छु जाता,
अगर मैं दरिया बन जाता।

चलती तु मेरे हर लहर के संग,
पर तुझ से अागे मैं बह ना पाता,
बाज़ु अाता तेरे हर पल,
मैं जो दरिया बन जाता।

साझ कि धुप को पीता मै सिने से
तु ओठो से अपनी मेरी ढलती गरमी पी जाती
 मैं जो दरिया बन जाता।
फेकती तु मुझमे पत्थर के टुकडे,
उन पत्थरों को वापस तेरे आँचल में कर जाता
 मैं जो दरिया बन जाता।

मैं सब मे जो सर्द हो जाता
तुम थक कर आती जो मेरे दर्पण करने
मैं पैरों तले तेरे बहता ही जाता
ठंड पडे़ उन पाओं को छपकाती जो मुझमें तुम
उलास तले मैं मध्यम हो जाता
 मैं जो दरिया बन जाता।

शिकायत लेकर जो तेरा रूठा मन आता
मैं सिने मे अपने तेरा आसूँ समाता
फिर फिके उन आसूँओ को नरमी से अपने
शहद के लप सा मिठा बनाता
 मैं जो दरिया बन जाता।

मैं मिला कर तुमसे सारे कदमो को,
तेरे गम का किनारा बन जाता,
अगर मैं दरिया बन जाता।

तु रूठती जो मुझस, विलीन मैं गहरे सागर मे हो जाता,
फिर मनाने वासते मैं बाहों मे तेरे,
सर सर बहता वादियों से चला आता,
जो मैं दरिया बन जाता।    
         
                    -प्रियाँशु

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