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Monday, May 2, 2016

केसर

मैं केसर एक बाग का,
मुझे हवा तुम्हारी दूर से अाई,
तुम जीभ को भाती रसमलाई,
मुझे भीतर अपने घोलने आई!

मै गाढा,गीला,बहता केसर,
तुम मर्ज़ सी बेजान पडी
बन के औसधी गिर गया बदन पर,
हौले से तेरी जान खिली!

तुम चाँद से हो जाओ जो रूसवा,
चाँदनी की चाहत मे,
मैं केसर बन आऊ डिबिया मे,
लत-पत सी एक आहट मे!

चहरे की अरदास बुझाने,
खफाओ की डोरी सुलझाने,
तेरे चंचल मन की राहत मे!

तुम खफा जो हो जाती जहान से सारे,
महफुज़ ना रहते जब खुशियो के तारे,
मैं धुली केसर बन हवा मे घुलता,
जाने को तेरी साँसो के भीतर,
के सुलाह करु बस खुशबू के सहारे!

मैं ख्वाबो के सिढियो तले,
मद्धम-मद्धम चढता जाऊ,
मैं बनु लाल सुगंधित केसर,
हर बार तुम्हे कुछ नया बनाऊ!

पर जोड दुँ हर कडी से तुमको
तिल हो तुम या बन जाओ शैल,
कि परखो जब तुम इकरार ये मेरा,
ना जहर मिले ना मिल पाए मैल!

                     #प्रियाँशु

अब लगता है कुछ ज़्यादा जी गया (Ab Lagta Hai Kuch Zyada Jee Gaya)




सलाखो से है रूठ गया मंन,
उड़ानो से जब रिश्ता बन गया,
ज़ुबान से निकल पड़े सारे नज़्म,
बुरा-भला सब राग बन गया,

अब लगता है कुछ ज़्यादा जी गया


सौदे बाज़ी कर के बहलाया था दिल को,
अब तोल मोल का औदा छान गया,
राज़ नही कुछ चुप पता खुद से ,
बहरूपिया वो प्यादा मार गया,

अब लगता है कुछ ज़्यादा जी गया


सहेज रहता था रीतो से अब तक ,
बैईमानी का अब कीड़ा पल गया,
मुताबिट नही अब शब्द याद मे ,
आज़ादी का मोम हलक मे गल गया,

अब लगता है कुछ ज़्यादा जी गया


सादगी जो घोल कर खारे जल मे,
शरबत सा वो तल गया,
फिर कसम घटक के परवांगी का,
यौवन को भी छल गया ,

अब लगता है कुछ ज़्यादा जी गया